
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में फैले , विंध्य क्षेत्र के मध्य भाग में स्थित रीवा शहर, मंत्रमुग्ध कर देने वाले मधुर गीत और बादशाह अकबर के नवरत्नों – तानसेन और बीरबल जैसे महान प्रतिभाओं का जन्मस्थान था।
रीवा के गोर्गी गाँव की पहाड़िया पुरातन काल से प्रस्तर शिल्प कला उद्योग का एक बड़ा केंद्र था ! यहाँ से तराशी गयी प्रस्तर प्रतिमाएँ एवं भवन निर्माण सामग्री दूर दूर तक ले जायी जाती थी ।
कलकल बहती बीहर और बिछिया नदी के किनारे बसा रीवा शहर , बाघेल वंश के शासकों की राजधानी के साथ-साथ विंध्य प्रदेश की राजधानी भी रहा है।
४ अप्रैल १९४८ को विंध्य प्रदेश की स्थापना हुई थी जिसके प्रथम राज प्रमुख महाराजा मार्तण्ड सिंह जी थे ।यह बी श्रेणी का राज्य था ।
इस ऐतिहासिक क्षेत्र को विश्व में सफेद शेरों की भूमि के नाम से भी जाना जाता है। रीवा का नाम रेवा नदी के नाम पर रखा गया, जिसे नर्मदा नदी का पौराणिक नाम कहा जाता है।
यह प्राचीन काल से ही एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग रहा है, जो कौशल, प्रयाग, बनारस, पाटलिपुत्र आदि को पश्चिमी और दक्षिणी भारत से जोड़ता रहा है।
बघेल राजवंश के शासनकाल से पहले अन्य राजाओं के शासकों जैसे गुप्त, कलचुरी वंश, चंदेल और प्रतिहार शासकों के शासन के भी प्रमाण मिलते है।
आजादी के बाद रीवा विध्य प्रदेश की राजधानी थी ! 1956 में राज्य पुनर्गठन के बाद मध्य प्रदेश , मध्य भारत , भोपाल राज्यों के साथ विन्ध्यप्रदेश भी मध्यप्रदेश में विलीन हो गया ! वर्तमान में रीवा संभागीय मुख्यालय और क्षेत्र का एक प्रमुख ऐतिहासिक शहर है।

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