Disk operating system DOS परिचय:-
एमएस डॉस एक ‘सीयूआई’ ऑपरेटिंग सिस्टम है। एक समय यह सबसे लोकप्रिय ऑपरेटिंग सिस्टम था। माइक्रो कम्प्यूटर में इसका उपयोग होता था। वर्ष 1984 में इनटेल 80286 प्रोसेसर युक्त माइक्रो कम्प्यूटर विकसित किये गये। तब इनमें ‘एमएस डॉस 3.0’ और ‘एमएस डॉस 4.0’ संस्करण विकसित करके इनका उपयोग किया गया ।
डॉस के कार्य:-
यह की बोर्ड से कमांड लेता है और कमांड की व्याख्या करता है।
यह सिस्टम की सभी फाइलों को उपयोगकर्ता को दिखा सकता है।
यह प्रोग्राम के लिए नई फाइलें और स्पेस बनाता है।
यह पुराने नाम के स्थान पर फाइल का नाम बदलता है।
यह फाइल का पता लगाने में मदद करता है।
डॉस की विशेषताएं:-
1. यह फाइल प्रबंधन को बेहतर बनाने में सहायक है। जैसे फाइल बनाना, संपादित करना, हटाना आदि।
2. यह उपयोगकर्ता ऑपरेटिंग सिस्टम है। कोई भी यूजर इस ऑपरेटिंग सिस्टम में एक समय पर काम कर सकता है।
3.एम एस डॉस 16 बिट ऑपरेटिंग सिस्टम है।
4. डॉस सरल टेक्स्ट कमांड ऑपरेटिंग सिस्टम है।
5. डॉस टेक्स्ट आधरित इंटरफेस का उपयोग करता है।
डॉस प्रोम्प्ट एवं ड्राइव नेम :-
डॉस के रैम में लोड होते ही, मॉनिटर पर निम्नलिखित में से कोई एक चिन्ह प्रदर्शित होता है-
A:/> or C:/>
उपर्युक्त चिन्ह डॉस प्राम्प्ट या सिस्टम प्रोम्प्ट कहलाते है। जो यह दर्शाते है की डॉस लोड हो चुका है, और यूजर कमांड लेने के लिए तैयार है। हम जो कमांड टाइप करते है। यह प्राम्प्ट के सामने ही टाइप होता है।
जब फ्लापी डिस्क पर कार्य करते है तो A:/> ये जो चिन्ह आता है जो A प्राम्प्ट कहते है।
हार्ड डिस्क पर कार्य करने पर C:/>आता है, जो C प्राम्प्ट कहलाता है।
अगर सिस्टम में दो फ्लापी ड्राइव है, तो पहली ड्राइव A प्राम्प्ट , तथा दूसरी ड्राइव B (B:/>) प्राम्प्ट द्वारा प्रदर्शित होती है।
इस प्रकार डॉस प्राम्प्ट, क्रियाशील ड्राइव तथा डायरेक्ट्री का नाम प्रदर्शित करता है। अगर हार्ड डिस्क में एक से अधिक पार्टीशन किये गये हो तो इन्हें क्रमश: C, D, E आदि नाम (ड्राइव नेम) दिया जाता है।
एफएटी(FAT):-
इसका पूरा नाम फाइल अलोकेशन टेबल है। इसका प्रयोग डिस्क में फाइलों के संग्रहण का रिकार्ड रखने के लिए होता है। फैट के प्रमुख प्रकार FAT12,FAT16,FAT32आदि है।
FAT फाइल, हार्ड डिस्क को छोटे- छोटे खंण्डो में विभाजित करती है। जिन्हें क्लस्टर कहते है। क्लस्टर एक या एक से अधिक संख्या डिस्क के घनत्व पर निर्भर करती है। यह संख्या 1 से 128 सैक्टर प्रति क्लस्टर हो सकते है।
जब हम कोई फाइल सेव करते है तो यह अपने आकार के अनुसार डाटा एरिया में एक या एक से अधिक क्लस्टर में संग्रहीत होती है।
फाइल एण्ड डायरेक्ट्री स्ट्रक्चर:-
फाइल के नाम :-
कम्प्यूटर में प्रत्येक फाइल का एक नाम होता है, इस नाम के दो भाग होते है-
1.प्राथमिक नाम 2. विस्तारित नाम
डायरेक्ट्री:-
डायरेक्ट्री एक कंटनेनर होता है जिसका प्रयोग फोल्डर और फाइल को स्टोर करने के लिए किया जाता है. यह एक हायरेकल तरीके से फाइल और फोल्डर को व्यवस्थित करता है,बहुत सारे यूजर एक फाइल सिस्टम में हजारों और लाखों फाइल को क्रियेट करते है।या हम अन्य शब्दों में कह कह सकते है कि डायरेक्ट्री एक डिस्क में फाइल का एक कलेक्सन होता है।
फाइल के नामकरण के नियम:-
फाइलके वातावरण में फाइल का नाम रखते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-
फाइल का प्राथमिक नाम 1 से 8 अक्षर हो सकता है।
नाम के बीच में स्पेस नहीं होना चाहिए।
डॉस में फाइल के नाम में अक्षरों (AसेZ), अंको [0,9] तथा केवल निम्न विशेष अक्षरों का उपयोग किया जा सकता है- ~ ! $ ^ & ( ) – { } इसके अतिरिक्त अन्य विशेषअक्षरों [ ] / <>आदि का उपयोग फाइल के नाम में नहीं किया जा सकता है।
डॉस कम्प्यूटर के विभिन्न उपकरण के लिए कुछ विशेष नामों का उपयोग करता है।जो डिवाइस नेम कहलाती है।
प्राथमिक नाम और विस्तारक नाम के बीच (.) डॉट होना चाहिए।
डॉट के पहले और बाद में खाली जगह नहीं होना चाहिए।
बूटिंग प्रोसेस :-
कम्प्यूटर को आन करने से लेकर डॉस प्राम्प्ट तक आने तक की पूरी प्रक्रिया बूटिंग प्रोसेस कहलाती है जिसमें मुख्य रूप से डास डिस्क से रैम में लोड होता है तथा कुछ अन्य क्रियायें सम्पन्न होती है ये क्रियाये तथा इनका क्रम निम्नलिखित है।
- पोस्ट 2.बूट रिकार्ड 3.डास कर्नेल
4. सिस्टम कन्फीग्रेशन 5.कमाण्ड.काम 6. आटो इक्ज्यूट.बैट। 7. डास प्राम्पट
पोस्ट (पावर आन सेल्फ टेस्ट):-
पावर आन होते ही कम्प्यूटर सबसे पहले अपनी स्वयं की मेमोरी तथा जुडे़ हुए सभी उपकरणों को चेक करता है कि वे सही कार्य कर रहे है या नही और कही कनेक्शन निकला तो नही है यह प्रक्रिया पावर आन सेल्फ टेस्ट या संक्षेप में पोस्ट कहलाती है किसी भी प्रकार की समस्या होने पर संबंधित एरर मेसेज आता है।
बूट रिकार्ड:-
पोस्ट द्वारा की जाने वाली चेकिंग के बाद कंट्रोल बोर्ड रिकार्ड को स्थानांतरित हो जाता है जो डिस्क के विषय में संपूर्ण जानकारी डिस्पले करता है यह जानकारी डिस्क से सूचनाए निकालने के लिए आवश्यक है।
डास कर्नेल:-
यह तीसरा और सबसे महात्वपूर्ण चरण है जिसमें डॉस कर्नेल मेमोरी में लोड होता है डॉस कर्नेल आपरेटिंग सिस्टम का केन्द्रीय भाग होता है जो दो विशेष सिस्टम फाइलो से मिलकर बनता है ये दोनो ही फाइले हिडेन मोड में होती है।
सिस्टम कन्फीग्रेशन:-
डास कर्नेल लोड होने के बाद कम्प्यूटर इस चरण में कन्फीग्रेशन फाइल को ढूढता है तथा इस फाइल के दिये गये पैरामीटर के अनुसार सिस्टम की विभिन्न इटरनल सेंटिग करता है। एस.वाई.एस एक ऐसी फाइल है जिसमें प्रयोगकर्ता स्वयं अपनी आवश्यकता के अनुसार सिस्टम सेटिंग से संबंधित विभिन्न मानों को निर्धारित कर सकता है।
कमाण्ड कोम फाइल:-
पॉचवे चरण में डॉस की एक और महत्वपूर्ण फाइल कॉम मेमोरी में लोड होती है। डॉस के सभी इन्टरनल कमाण्ड इस फाइल के माध्यम से चलते है।
ऑटो एक्सिक्युटेबिल बैच फाइल:-
इस चरण में कमाण्ड.काम फाइल स्वयं ही आटो एक्सिक्युटेबिल बैच फाइल को ढूढकर चलाता है। ऑटो एक्सिक्युटेबिल एक बैच फाइल है जिसके द्वारा हम सिस्टम की डेट, टाइम तथा विभिन्न साफ्टवेयर के पाथ सेट कर सकते है।
डॉस प्रोमट:-
पूरी प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद अंत में मानीटर पर डॉस प्रोमट दिखाई देता है जो यह बताता है कि डॉस लोड हो चुका है और कम्प्यूटर हमारे कार्य के लिए तैयार है।
डॉस सिस्टम फाइल:-
वे प्रमुख फाइल जिनमें मिलकर डॉस आपरेटिंग सिस्टम बना होता है डॉस की सिस्टम फाइले कहलाती है। ये फाइल्स कुछ विशेष कार्यों जैसे बूटिंग प्रक्रिया को सम्पन्न करती है। इनपुट/आउटपुट डिवाइसेस का निर्धारण तथा संयोजन करती है। डॉस के आतंरिक निर्देश को मेमोरी में लोड करना, स्टोरेज डिवाइसेस का प्रबंधन आदि कार्यो करती है।
इन फाइल्स के नाम SYS.COM आदि होते है जो यह दर्शाते है कि ये सिस्टम फाइल तथा कमाण्ड फाइल है। डॉस आपरेटिग सिस्टम तीन फाइलो से मिलकर बना है।
- IO.SYS और MS DOS.SYS FILES
- COMMAND.COM FILE
- CONFIG.SYS FILE