Symmetric and Asymmetric Cryptography (AES, RSA, Overview)
किसी भी डिजिटल संचार में सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि डेटा केवल वही व्यक्ति पढ़ सके जिसके लिए वह भेजा गया है। क्रिप्टोग्राफी वह विज्ञान है जो इस समस्या का समाधान देता है, यह सादे डेटा को एक ऐसे रूप में बदल (encrypt) देती है जो बिना सही ‘की’key के पढ़ा नहीं जा सकता। जब हम UPI से पेमेंट करते हैं, अमेज़न पर कार्ड डिटेल्स एंटर करते हैं या आधार OTP प्राप्त करते हैं तो इन सभी के पीछे क्रिप्टोग्राफिक एल्गोरिथ्म काम कर रहे होते हैं।
क्रिप्टोग्राफी को मुख्यतः दो श्रेणियों में बाँटा जाता है — सिमेट्रिक(Symmetric) क्रिप्टोग्राफी और एसिमेट्रिक(Asymmetric) क्रिप्टोग्राफी। दोनों के सिद्धांत, उपयोग के तरीके और प्रदर्शन में मौलिक अंतर है, और आधुनिक सिक्योर सिस्टम वास्तव में इन दोनों का संयुक्त उपयोग करते हैं।
क्रिप्टोग्राफी की मूल अवधारणा Cryptography:(Definition and Need) (Imp.)
क्रिप्टोग्राफी में मूल डेटा को ‘प्लेनटेक्स्ट’ कहा जाता है और इसे एन्क्रिप्ट करने के बाद जो रूप मिलता है उसे ‘साइफरटेक्स्ट’ कहते हैं। यह रूपांतरण एक कुंजी(key) और एक एल्गोरिथ्म के संयोजन से होता है। जब रिसीवर साइफरटेक्स्ट प्राप्त करता है तो वह डिक्रिप्शन प्रक्रिया से उसे वापस प्लेनटेक्स्ट में बदलता है। क्रिप्टोग्राफी के तीन मूलभूत लक्ष्य होते हैं —
Confidentiality (गोपनीयता) कॉन्फिडेंशियलिटी अर्थात डेटा केवल अधिकृत व्यक्ति पढ़ सके,
Integrity (अखंडता) इंटेग्रिटी अर्थात डेटा में किसी ने बदलाव नहीं किया हो, और
Authentication (प्रमाणीकरण) ऑथेंटिकेशन अर्थात भेजने वाले की पहचान सत्यापित हो सके।
क्रिप्टोग्राफिक एल्गोरिथ्म की सुरक्षा कुंजी की लंबाई और एल्गोरिथ्म की जटिलता पर निर्भर करती है। एक लंबी कुंजी का अर्थ है कि किसी हमलावर के लिए सभी संभावित कुंजियों को आजमाकर डेटा तोड़ना — जिसे ब्रूट फोर्स अटैक कहते हैं — व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है।
सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी Symmetric Cryptography— एक ‘की’ key का सिद्धांत (Imp.)
सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी में एन्क्रिप्शन और डिक्रिप्शन दोनों के लिए एक ही कुंजी (key) का उपयोग होता है। इसका अर्थ है कि भेजने वाला और प्राप्त करने वाला दोनों के पास समान सीक्रेट कुंजी होनी चाहिए। यह एक ऐसे ताले की तरह है जिसे एक ही चाबी से खोला और बंद किया जा सकता है। इस प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती, key को सुरक्षित रूप से दोनों पक्षों तक पहुँचाना। यदि कुंजी ट्रांसमिशन के दौरान चोरी हो जाए तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था टूट जाती है। इसे की डिस्ट्रिब्यूशन प्रॉब्लम कहा जाता है।
सिमेट्रिक एल्गोरिथ्म की सबसे बड़ी ताकत उसकी गति है। चूँकि गणितीय प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से सरल होती है, सिमेट्रिक एन्क्रिप्शन एसिमेट्रिक एन्क्रिप्शन से सैकड़ों गुना तेज होता है। यही कारण है कि बड़ी मात्रा में डेटा, जैसे संपूर्ण फाइल या वीडियो स्ट्रीम, को एन्क्रिप्ट करने के लिए सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी का उपयोग होता है।
AES — एडवांस्ड एन्क्रिप्शन स्टैंडर्ड (Advanced Encryption Standard (Imp.)
AES वर्तमान समय में विश्व का सबसे व्यापक रूप से उपयोग होने वाला सिमेट्रिक एन्क्रिप्शन एल्गोरिथ्म है। इसे अमेरिका की संस्था NIST (National Institute of Standards and Technology) ने 2001 में स्टैंडर्ड के रूप में स्वीकृत किया। AES से पहले DES (Data Encryption Standard) उपयोग होता था जिसकी 56 बिट कुंजी आधुनिक कंप्यूटिंग पावर के सामने असुरक्षित हो गई थी। AES को बेल्जियम के दो क्रिप्टोग्राफर्स द्वारा डिज़ाइन किए गए रिजेंडल एल्गोरिथ्म पर आधारित बनाया गया।
AES तीन कुंजी लंबाइयों में उपलब्ध है — 128 बिट, 192 बिट और 256 बिट। कुंजी जितनी लंबी होगी सुरक्षा उतनी अधिक होगी परंतु प्रोसेसिंग समय भी उतना ही बढ़ेगा। AES-256 को सबसे सुरक्षित माना जाता है और इसे अमेरिकी सरकार टॉप सीक्रेट जानकारी के लिए भी उपयोग करती है। AES की कार्यप्रणाली में डेटा को 128 बिट के ब्लॉक्स में बाँटा जाता है और फिर इन ब्लॉक्स पर कई राउंड में Substitution, Permutation और Key Mixing जैसी प्रक्रियाएँ की जाती हैं। 128 बिट कुंजी के लिए 10 राउंड, 192 बिट के लिए 12 राउंड और 256 बिट के लिए 14 राउंड होते हैं।
भारतीय संदर्भ में AES का उपयोग सर्वव्यापी है। जब आप अमेज़न पर अपना कार्ड सेव करते हैं तो उस डेटा को AES-256 से एन्क्रिप्ट किया जाता है। UPI ट्रांजैक्शन में डिवाइस से सर्वर तक डेटा ट्रांसमिशन AES एन्क्रिप्शन से सुरक्षित होता है। व्हाट्सऐप के मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन में AES का उपयोग होता है। आधार डेटाबेस में नागरिकों का बायोमेट्रिक डेटा AES-256 से एन्क्रिप्टेड स्टोर होता है।
Real life Indian Example: Aadhaar Authentication –
UIDAI (Unique Identification Authority of India) Aadhaar Number, Biometric Data (Fingerprint, Iris), और Demographic Data को AES256 Encryption का उपयोग करके Secure Servers पर Store करता है , और Authentication के दौरान Data को AES से Encrypt करके Network पर भेजा जाता है।
सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी के अन्य उदाहरण
DES और इसका सुधारित रूप ट्रिपल DES ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं भले ही आज इन्हें असुरक्षित माना जाता है। ब्लोफिश और ट्वोफिश भी सिमेट्रिक एल्गोरिथ्म हैं जो कुछ विशेष एप्लीकेशन में उपयोग होते हैं। ChaCha20 गूगल द्वारा विकसित एक आधुनिक सिमेट्रिक एल्गोरिथ्म है जो मोबाइल डिवाइस पर AES से भी तेज प्रदर्शन देता है और इसे कई HTTPS कनेक्शन में उपयोग किया जाता है।
एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी(Asymmetric Cryptography) — दो कुंजियों का सिद्धांत (Imp.)
एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी, जिसे पब्लिक की क्रिप्टोग्राफी भी कहते हैं, में दो अलग-अलग परंतु गणितीय रूप से संबंधित कुंजियाँ उपयोग होती हैं — पब्लिक की और प्राइवेट की। पब्लिक की को सार्वजनिक रूप से किसी के साथ भी शेयर किया जा सकता है जबकि प्राइवेट की केवल मालिक के पास गुप्त रहती है। इस प्रणाली की मौलिक विशेषता यह है कि पब्लिक की से एन्क्रिप्ट किया गया डेटा केवल संबंधित प्राइवेट की से ही डिक्रिप्ट हो सकता है, और इसका विपरीत भी सत्य है।
एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी ने सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी की सबसे बड़ी समस्या — की डिस्ट्रिब्यूशन प्रॉब्लम — का समाधान दिया। यहाँ कोई गुप्त कुंजी पहले से शेयर करने की आवश्यकता नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति आपको सुरक्षित संदेश भेजना चाहता है तो वह आपकी पब्लिक की से एन्क्रिप्ट करेगा, और केवल आप ही अपनी प्राइवेट की से उसे डिक्रिप्ट कर सकते हैं।
- Public Key से Encrypt > केवल Private Key से Decrypt (Confidentiality – गोपनीयता)।
Digital Signature में संदेश को Private Key से Sign किया जाता है तथा Public Key द्वारा Verify किया जाता है।
RSA एल्गोरिथ्म (Imp.)
RSA सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से उपयोग होने वाला एसिमेट्रिक एल्गोरिथ्म है। इसका नाम इसके आविष्कारकों — रॉन रिवेस्ट, आदि शामिर और लियोनार्ड एडलमैन — के नाम के प्रथम अक्षरों से बना है और इसे 1977 में MIT में विकसित किया गया। RSA का गणितीय आधार बड़ी संख्याओं को उनके प्राइम फैक्टर्स में तोड़ने की कठिनाई पर निर्भर करता है।
RSA की कार्यप्रणाली को समझने के लिए इसकी मूल अवधारणा देखना आवश्यक है। RSA में दो बड़ी प्राइम संख्याओं को आपस में गुणा करके एक बहुत बड़ी संख्या प्राप्त की जाती है जो पब्लिक की का आधार बनती है। इस बड़ी संख्या को वापस उन दो प्राइम संख्याओं में तोड़ना — जिसे फैक्टराइजेशन कहते हैं — कंप्यूटेशनल रूप से अत्यंत कठिन है, विशेषकर जब संख्याएँ 2048 बिट या उससे अधिक लंबी हों। यही गणितीय कठिनाई RSA की सुरक्षा की नींव है।
RSA की कुंजी लंबाई सामान्यतः 1024, 2048 या 4096 बिट होती है। 2025 तक 2048 बिट को न्यूनतम सुरक्षित मानक माना जाता है क्योंकि कंप्यूटिंग पावर बढ़ने के साथ छोटी कुंजियाँ असुरक्षित होती जा रही हैं। NIST ने भविष्य में क्वांटम कंप्यूटिंग के खतरे को देखते हुए 3072 बिट या अधिक की सिफारिश शुरू कर दी है।
RSA की सबसे बड़ी सीमा इसकी गति है। RSA की गणितीय प्रक्रिया — बड़ी संख्याओं का मॉड्यूलर एक्सपोनेंशिएशन — AES की तुलना में बहुत धीमी है। इसलिए RSA का उपयोग बड़ी मात्रा में डेटा एन्क्रिप्ट करने के लिए नहीं किया जाता बल्कि छोटी जानकारी जैसे सिमेट्रिक कुंजी को सुरक्षित रूप से ट्रांसमिट करने के लिए किया जाता है।
एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी के अन्य उदाहरण
ECC यानी एलिप्टिक कर्व क्रिप्टोग्राफी एक आधुनिक एसिमेट्रिक एल्गोरिथ्म है जो RSA की तुलना में बहुत छोटी कुंजी लंबाई में समान सुरक्षा स्तर प्रदान करता है। 256 बिट की ECC कुंजी लगभग 3072 बिट RSA कुंजी के समान सुरक्षित होती है। यही कारण है कि मोबाइल डिवाइस और IoT उपकरणों में ECC का उपयोग बढ़ रहा है क्योंकि यह कम प्रोसेसिंग पावर में भी तेजी से काम करता है। डिफी-हेलमैन एल्गोरिथ्म एक विशेष एसिमेट्रिक तकनीक है जिसका मुख्य उपयोग दो पक्षों के बीच एक सुरक्षित चैनल पर सिमेट्रिक कुंजी का आदान-प्रदान करना है।
RSA के उपयोग (Applications) Imp.
(1) Digital Signatures
(2) SSL/TLS Certificates –
(3) Email Encryption (S/MIME, PGP) –
(4) Secure Key Exchange (Hybrid Cryptography) –
(5) VPN and SSH Authentication –
Reallife Indian Example : Income Tax (ITR) Filing –
जब हम Income Tax Return (ITR) फाइल करते हैं, तो हम Digital Signature Certificate (DSC), जो RSA2048 / RSA3072 पर आधारित होता है , का उपयोग करके ITR को Sign (Encrypt with Private Key) करते हैं ,और Income Tax Department उसे Public Key से Verify करता है , यह Digital Signature (IT Act 2000 Sec 3) के तहत कानूनी रूप से Valid होता है।
हाइब्रिड क्रिप्टोसिस्टम Hybrid Cryptography — दोनों का संयुक्त उपयोग (Imp.)
व्यवहार में आधुनिक सुरक्षित सिस्टम कभी भी केवल एक प्रकार की क्रिप्टोग्राफी पर निर्भर नहीं रहते — वे हाइब्रिड क्रिप्टोसिस्टम का उपयोग करते हैं जो सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक दोनों की ताकतों को जोड़ता है। यह दृष्टिकोण RSA की सुरक्षा और AES की गति — दोनों का लाभ देता है।
जब हम किसी वेबसाइट पर HTTPS के माध्यम से जुड़ते हैं तो SSL/TLS हैंडशेक प्रक्रिया होती है। पहले चरण में सर्वर अपनी पब्लिक ‘की’ क्लाइंट को भेजता है। क्लाइंट एक रैंडम सिमेट्रिक कुंजी(key) जनरेट करता है और इसे सर्वर की पब्लिक की से एन्क्रिप्ट करके भेज देता है — यह एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी का उपयोग है। इसके बाद की संपूर्ण बातचीत — चाहे वह अमेज़न पर ब्राउज़िंग हो या UPI ट्रांजैक्शन का संपूर्ण डेटा — उस सिमेट्रिक कुंजी से एन्क्रिप्ट होती है क्योंकि यह बहुत तेज है। इस प्रकार एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी का उपयोग केवल कुंजी की सुरक्षित डिलीवरी के लिए होता है, और वास्तविक डेटा ट्रांसफर सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी से होता है।
भारत में IRCTC, UPI Apps और सभी बैंकिंग वेबसाइट्स इसी हाइब्रिड मॉडल पर काम करती हैं। डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट जो इनकम टैक्स फाइलिंग और ई-टेंडरिंग में उपयोग होते हैं, वे भी RSA जैसे एसिमेट्रिक एल्गोरिथ्म पर आधारित होते हैं परंतु वास्तविक डॉक्यूमेंट डेटा को सिमेट्रिक तरीके से प्रोसेस किया जाता है।
Reallife Indian Example : UPI (Unified Payments Interface) and HTTPS –
जब हम UPI App (GPay / PhonePe) खोलते हैं, तो App Server से HTTPS (TLS – जो RSA + AES का उपयोग करता है) के माध्यम से Connect होता है , Session Key Exchange RSA से होती है , और Payment Data (Account, Amount, PIN) AES से Encrypt होता है , यह Hybrid Cryptography है।
सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी की तुलना (Imp.)
सिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी में एक ही कुंजी होती है जबकि एसिमेट्रिक में दो अलग कुंजियाँ होती हैं। गति की दृष्टि से सिमेट्रिक बहुत तेज है जबकि एसिमेट्रिक धीमा है क्योंकि इसकी गणितीय प्रक्रिया जटिल होती है। की डिस्ट्रिब्यूशन की समस्या सिमेट्रिक में गंभीर है क्योंकि कुंजी को सुरक्षित रूप से शेयर करना कठिन है, जबकि एसिमेट्रिक में यह समस्या नहीं है क्योंकि पब्लिक की खुलेआम शेयर की जा सकती है।
उपयोग के क्षेत्र में सिमेट्रिक बड़ी मात्रा के डेटा एन्क्रिप्शन के लिए उपयुक्त है जबकि एसिमेट्रिक कुंजी एक्सचेंज, डिजिटल सिग्नेचर और ऑथेंटिकेशन के लिए उपयुक्त है। स्केलेबिलिटी की दृष्टि से सिमेट्रिक में जितने उपयोगकर्ता बढ़ते हैं उतनी ही कुंजियों का प्रबंधन कठिन होता जाता है, जबकि एसिमेट्रिक में यह समस्या नहीं है क्योंकि हर उपयोगकर्ता की केवल एक की-पेयर होती है।
क्रिप्टोग्राफी के लाभ और सीमाएँ
क्रिप्टोग्राफी के लाभों में डेटा की गोपनीयता सुरक्षित रहना, अनधिकृत एक्सेस से बचाव, डिजिटल ट्रांजैक्शन में विश्वास स्थापित होना और सरकारी तथा वित्तीय सेवाओं में सुरक्षित संचार संभव होना शामिल है। इसकी सीमाओं में यह तथ्य शामिल है कि कुंजी प्रबंधन एक जटिल कार्य है, यदि प्राइवेट की चोरी हो जाए तो संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, और क्वांटम कंप्यूटिंग के भविष्य के विकास से RSA जैसे एल्गोरिथ्म पर खतरा मंडरा रहा है। NIST ने इसी कारण 2024 में पोस्ट-क्वांटम क्रिप्टोग्राफी स्टैंडर्ड्स जारी किए हैं जो भविष्य के क्वांटम कंप्यूटरों के सामने भी सुरक्षित रह सकें।
संभावित प्रश्न
2 अंक:
- सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी में मूलभूत अंतर बताइए।
- AES का पूरा नाम और इसकी मुख्य कुंजी लंबाइयाँ क्या हैं?
- RSA का नाम किनके नाम पर रखा गया है?
- हाइब्रिड क्रिप्टोसिस्टम क्या है?
5 अंक:
- AES की कार्यप्रणाली का वर्णन कीजिए।
- RSA एल्गोरिथ्म के गणितीय आधार को समझाइए।
- सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी की तुलना कीजिए।
- की डिस्ट्रिब्यूशन प्रॉब्लम क्या है और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी इसे कैसे हल करती है?
15 अंक:
- सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। AES और RSA की कार्यप्रणाली, उपयोग और भारतीय संदर्भ में उदाहरणों सहित विश्लेषण कीजिए।
- HTTPS में उपयोग होने वाले हाइब्रिड क्रिप्टोसिस्टम को विस्तार से समझाइए तथा यह बताइए कि यह सिमेट्रिक और एसिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी की किन-किन सीमाओं को दूर करता है।