Unit I-Basic concept

Paper -Tally

Unit I
Unit II
Unit III
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Unit V

Basic Concept of Accounting:-

आधुनिक व्यवसाय का आकार इतना बड़ा हो गया है कि उसमें प्रतिदिन हजारों व्यावसायिक लेनदेन होते रहते हैं। इन सभी लेनदेनों को याद रखकर व्यवसाय चलाना संभव नहीं है। इसलिए इन लेनदेनों का क्रमबद्ध लेखा (records) रखा जाता है। लेनदेनों को क्रमबद्ध ढंग से लिखने की कला और उसके प्रयोग की विधि को ही लेखाशास्त्र कहते हैं। लेखाशास्त्र के व्यावहारिक रूप को लेखांकन (Accounting) कहा जाता है।

किसी व्यवसाय के वित्तीय लेनदेन का हिसाब रखने, उसका सारांश तैयार करने, रिपोर्टिंग करने तथा विश्लेषण करने की कला ही एकाउंटिंग कहलाती है। एकाउंटिंग का कार्य करने वाले व्यक्ति को अकाउंटेंट कहा जाता है। पहले अकाउंटेंट की भूमिका केवल रिकॉर्ड-कीपर जैसी मानी जाती थी, परंतु अब एकाउंटिंग को प्रबंधन के एक ऐसे उपकरण के रूप में देखा जाता है जो संगठन के भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है।

स्मिथ एवं एशबर्न के अनुसार — लेखांकन मुख्यतः वित्तीय प्रकृति के व्यावसायिक लेनदेनों और घटनाओं को अभिलेखित (record) करने तथा वर्गीकृत करने का विज्ञान है, और उनका सारांश बनाने, विश्लेषण-व्याख्या करने तथा परिणामों को निर्णय लेने वाले व्यक्तियों तक पहुँचाने की कला है। इस परिभाषा के अनुसार लेखांकन विज्ञान भी है और कला भी, परंतु यह पूर्ण रूप से निश्चित विज्ञान नहीं है, लगभग पूर्ण विज्ञान कहा जा सकता है। (Imp.)

Financial Statements:-

फाइनेंशियल स्टेटमेंट को वित्तीय विवरण भी कहा जाता है। यह सामान्यतः वर्ष के अंत में तैयार किए जाते हैं। इनमें व्यवसाय के कामकाज का पूरा लेखा-जोखा होता है, अर्थात नकदी प्रवाह, लाभ, विकास आदि की जानकारी। इनसे कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन तथा बाजार में उसकी स्थिति के बारे में जानकारी मिलती है। इसमें मुख्य रूप से चार विवरण शामिल होते हैं:

Trading Account (व्यापार खाता)

Balance Sheet (चिट्ठा / स्थिति विवरण)

Profit and Loss Account (लाभ-हानि खाता)

Cash Flow Statement (रोकड़ प्रवाह विवरण)

1-Balance sheet or statement of financial position:-

किसी निश्चित तिथि पर कंपनी की संपत्तियों (Assets) और देनदारियों (Liabilities) को दर्शाने वाली रिपोर्ट को बैलेंस शीट कहते हैं। यह किसी चालू व्यवसाय की एक निश्चित समय पर वित्तीय तस्वीर होती है। किसी भी कंपनी की बैलेंस शीट, लाभ-हानि खाता तैयार होने के बाद ही बनाई जा सकती है।

इसके दो भाग होते हैं:

दायित्व पक्ष (Liabilities Side): करंट लायबिलिटीज (लेनदार, ऋण) तथा लॉन्ग-टर्म लायबिलिटीज

संपत्ति पक्ष (Assets Side): करंट एसेट्स (रोकड़, बैंक बैलेंस, देनदार) तथा फिक्स्ड एसेट्स (मशीनरी, भवन, वाहन)

2-Profit and loss report (P&L report), Or Income statement:-

यह एक वित्तीय विवरण है जिसमें एक निश्चित अवधि (तिमाही या वर्ष) में कंपनी की आय और व्यय का हिसाब रहता है। इस अवधि के राजस्व, लागत और खर्चों को संक्षेप में इसमें प्रस्तुत किया जाता है। इसे आय का विवरण भी कहते हैं। इससे यह पता चलता है कि कंपनी अपना राजस्व बढ़ाने या लागत घटाने में कितनी सक्षम रही है। (Imp.)

इसमें दो भाग होते हैं:

  • आय (Income): सेल्स/रेवेन्यू तथा अन्य आय (ब्याज आय, कमीशन आदि)
  • व्यय (Expenses): प्रत्यक्ष व्यय (कच्चा माल, वेतन) तथा अप्रत्यक्ष व्यय (किराया, बिजली)

इससे संबंधित एक अन्य विवरण होता है — Statement of Changes in Equity (पूंजी परिवर्तन विवरण), जिसे Statement of Retained Earnings भी कहते हैं। इसमें एक निश्चित अवधि में कंपनी की पूंजी (equity) में हुए परिवर्तनों की जानकारी दी जाती है।

3- A Cash flow statement:-

यह विवरण कंपनी की रोकड़ संबंधी गतिविधियों — विशेष रूप से परिचालन (operating), निवेश (investing) और वित्तपोषण (financing) गतिविधियों को एक निश्चित अवधि के लिए दर्शाता है। यह कंपनी की वर्तमान वित्तीय स्थिति को संक्षेप में प्रस्तुत करता है और कैश बैलेंस में हुए बदलाव को दिखाता है।

4- Trading Account :-

यह केवल केवल ट्रेडिंग कंपनियों के लिए बनाया जाता है।

इस रिपोर्ट में –

१- सकल लाभ/हानि की गणना

२- ओपनिंग/क्लोजिंग स्टॉक एवं

३- प्रचालन आय रखी जाती है

Financial statement analysis:-

किसी कंपनी के बारे में निर्णय लेने के लिए उसके फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स (बैलेंस शीट, लाभ-हानि खाता, कैश फ्लो स्टेटमेंट) का विश्लेषण किया जाता है। इसका उद्देश्य पिछले और वर्तमान वित्तीय आँकड़ों की जाँच करके कंपनी के प्रदर्शन और वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन करना तथा भविष्य के जोखिम और संभावनाओं का अनुमान लगाना है।

कंपनी के बाहरी हितधारक (stakeholders) इसका उपयोग संगठन के समग्र स्वास्थ्य और व्यावसायिक मूल्य को समझने के लिए करते हैं, जबकि आंतरिक घटक इसे वित्त-प्रबंधन के निगरानी उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। (Imp.)

Cost Centers:-

कास्ट सेंटर किसी प्रतिष्ठान का वह प्रावधान है जिसमें किसी विशेष बिंदु या विशेष प्रयोजन पर किए गए खर्चों को अलग से दर्शाया जाता है। किसी लेनदेन का लेजर अकाउंट केवल लेनदेन की प्रकृति बताता है — वाउचर के narration भाग के अलावा यह पता नहीं चलता कि लेनदेन प्रतिष्ठान के किस विभाग से संबंधित है। उदाहरण के लिए, किसी कंपनी की विभिन्न शाखाएँ या उसके उत्पाद भी कॉस्ट सेंटर हो सकते हैं।

टैली में कॉस्ट सेंटर दो प्रकार के होते हैं:

  • प्राइमरी कॉस्ट सेंटर
  • सेकेंडरी कॉस्ट सेंटर

सेकेंडरी कॉस्ट सेंटर एक सबग्रुप की तरह होता है जो किसी प्राइमरी कॉस्ट सेंटर के अंतर्गत परिभाषित किया जाता है। यदि टैली में अभी तक कोई कॉस्ट सेंटर परिभाषित नहीं किया गया है, तो सबसे पहले बनाया गया कॉस्ट सेंटर स्वतः प्राइमरी कॉस्ट सेंटर माना जाएगा। एक प्राइमरी कॉस्ट सेंटर के अंतर्गत कई सेकेंडरी कॉस्ट सेंटर हो सकते हैं, परंतु एक सेकेंडरी कॉस्ट सेंटर का केवल एक ही प्राइमरी कॉस्ट सेंटर हो सकता है। (Imp.)

How to Create Cost Centre in Tally (टैली में कॉस्ट सेंटर कैसे बनाएँ)

कॉस्ट सेंटर बनाने के लिए सबसे पहले F11: Accounting Features में जाकर Maintain Cost Centers विकल्प को Yes पर सेट करना होता है। इसे Yes करते ही Accounts Info मेन्यू में Cost Centers नामक विकल्प दिखाई देने लगता है। टैली में डिफॉल्ट रूप से सेल्स अकाउंट्स, परचेज अकाउंट्स, एक्सपेंस और इनकम ग्रुप्स के अंतर्गत आने वाले लेजर अकाउंट्स के लिए यह फीचर पहले से एक्टिवेट रहता है।

टैली में हम Single तथा Multiple — दोनों प्रकार के कॉस्ट सेंटर बना सकते हैं।

Single Cost Centre बनाने की प्रक्रिया:

Gateway of Tally → Accounts Info → Cost Centers → Create

Create पर क्लिक करते ही Cost Centre Creation स्क्रीन खुलती है, जिसमें निम्न फील्ड होते हैं:

Name: इस फील्ड में कॉस्ट सेंटर का नाम दर्ज किया जाता है,

 जैसे — किसी विभाग, टास्क, एक्टिविटी या फंक्शन का नाम।

Alias: यदि आवश्यक हो तो कॉस्ट सेंटर का कोई वैकल्पिक नाम (जैसे संक्षिप्त नाम या कोड नंबर) यहाँ दर्ज किया जा सकता है।

Under: इस फील्ड में List of Cost Centers में से उस पैरेंट कॉस्ट सेंटर का चयन किया जाता है, जिसके अंतर्गत नया कॉस्ट सेंटर बनाया जाना है। यदि कॉस्ट सेंटर को Primary Cost Centre बनाना हो तो लिस्ट में से Primary विकल्प चुना जाता है। (Imp.)


Basic Concept of Inventory (बेसिक कांसेप्ट ऑफ़ इन्वेंटरी):-

इन्वेंटरी का अर्थ है — कच्चा माल, बिक्री के लिए तैयार आइटम तथा वह माल जो अभी बिक्री हेतु तैयार हो रहा है, इन तीनों का समूह। दूसरे शब्दों में, इन्वेंटरी वह राशि है जो किसी कंपनी द्वारा कच्चे माल, अर्ध-निर्मित माल और तैयार माल पर खर्च की जाती है। कंपनी की बैलेंस शीट में इन्वेंटरी को एक संपत्ति (Asset) माना जाता है, क्योंकि बिक्री होने पर यह नकदी (Cash) में परिवर्तित हो जाती है। (Imp.)

उत्पादन कंपनी की इन्वेंटरी के प्रकार:

  1. Raw Material (कच्चा माल): उत्पादन प्रक्रिया पूरी करने के लिए प्रयोग होने वाले वे आइटम, जिनसे अंतिम बिक्री योग्य उत्पाद तैयार होता है, रॉ मटेरियल कहलाते हैं।
  2. Work in Process (अर्ध-निर्मित माल): जो माल अभी तैयार होने की प्रक्रिया में है, उसके मूल्य को Work in Process कहा जाता है।
  3. Finished Goods (तैयार माल): वह इन्वेंटरी जो पूरी तरह निर्मित हो चुकी है और बिक्री के लिए उपलब्ध है, फिनिश्ड गुड्स कहलाती है।
  4. Consumables (उपभोज्य सामग्री): वे आइटम जो कंपनी के नियमित कार्यों में प्रयोग होते हैं, परंतु उत्पाद का हिस्सा नहीं बनते।

University Exam Questions :-

1- लेखांकन को समझाइये। लेखांकन की विभिन्‍न अवधारणाओं का विस्‍तृत रूप में वर्णन कीजिए। -2019 jan

2- लेखाविधि की निम्‍न अवधारणाओं को  समझाइये : june 2023

     (i)   लागत अवधारणा

     (ii)  मुद्रा-मापन अवधारणा

3- वित्‍तीय लेखांकन क्‍या है? वित्तिय लेखांकन के लाभ एवं हानियों को विस्‍तार से समझाइये – june 2015

4- टैली एकाउन्टिंग क्‍या है? टैली एकाउन्टिंग की विशेषताओ को समझाइये। – june 2015

5- वित्तिय लेखांकन क्‍या है? इसके उदेश्य एवं महत्‍व को समझाइये।  – june 2018

6 – वित्तीय लेखांकन में अपनाए जाने वाले मूल लेखांकन सिद्धांतो एवं अवधारणाओं की व्याख्या कीजिये। जून 2026

7 – टैली स्क्रीन के विभिन्न घटको तथा उनके कार्यो की विस्तार से व्याख्या कीजिये। जून 2026

8 – लेखांकन की मूल अवधारणाएं क्या है ? इसके उद्देश्य को समझाइए। दिसंबर 2025

9 – टैली में कॉन्फ़िगरेशन मेनू को विस्तार से समझाइए। दिसंबर 2025

ARUN COMPUTER

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